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अपने दिल को कलम बनाकर
तेरी यादों की स्याही से
लिखता हूँ मैं कुछ आशार
शायर नहीं हूँ मैं
हो जाए न रुसवाई तेरी
डरता हूँ सब कहने से
नहीं करता सब इज़हार
कायर नहीं हूँ मैं
चूम न पाता अधरों को तेरे तो
पड़ा रहता क़दमों में तेरे
हो जाता तुझपे निसार
झाँझर नहीं हूँ मैं
तुझसे ही था वज़ूद मेरा
तुझको खोकर अमित
किसका करूँ इंतज़ार
मयस्सर नहीं हूँ मैं
In response to:Reena’s Exploration Challenge #Week 61

Deep exploration indeep indeed awesome
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