Kabhi Paya hi nahin (I never had it) — by hecblogger
वसूलता है साकी दाम उस जाम के
जो उसने मुझे पिलाया ही नहीं ।१।
रही हसरत कभी रूठ कर देखूँ मैं भी
कभी किसी ने मनाया ही नहीं ।२।
है धूप बहुत, कठिन है राह मगर
उसकी ज़ुल्फ़ का साया ही नहीं ।३।
मत दे इलज़ाम मुझे लापरवाही का
क्या खोता उसे, कभी पाया ही नहीं ।४।
क्या मनाता है रंज अमित उस जज़्बे का
जो उसने कभी निभाया ही नहीं ।५।
In response to: Reena’s Exploration Challenge #106
