Yaadon ke galiyaron mein (In memory lanes) …. Amit Agrawal’s take on Challenge #87
फिर गुज़रा है वो यादों के गलियारों में
कभी गुज़रीं थीं शामें जिसकी बाँहों में
याद है क्या तुम्हें वो भी एक ज़माना था
बिछाते थे आंखें जब तुम हमारी राहों में
अपना न सही, कर इतना एहसान मगर
खो जाने दे मुझे सपनो की पनाहों में
नहीं मिलती है सभी को चाहत अपनी
कुछ उम्र गुज़ार देते हैं अपनी चाहों में
यूँ ही बेलग़ाम लिखता जा रहा हूँ अमित
सोचता हूँ कुछ तो असर होगा आहों में
In response to: Reena’s Exploration Challenge # 87
