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रख दिया है दिल चाकू की धार पे
रिसते हैं ये घाव तुम्हारे इंतज़ार में ।१।
यूँ ही महफ़िल से उठ आया हूँ मैं
शायद हाँ छिपी थी तेरे इंकार में ।२।
और कहीं जाके रुकती नहीं नज़र
उलझ गया है मन तुम्हारे शृंगार में ।३।
उसके घर में देर है अंधेर नहीं हैं
हमने रातें गुज़ार दीं इसी ऐतबार में।४।
वो अब नज़रें चुराने लगा अमित
क्या रखा है ऐसे वस्ल-ए-यार में ।५।
In response to: Reena’s Exploration Challenge # 86
