Indira’s contribution to Exploration Challenge #70
Reena’s Exploration Challenge #70 Reena Saxena

कितनी छानी ख़ाक
गुजरे कहाँ कहाँ से
कितने गढ़े थे चेहरे
बस तेरा एक भुलाने को
सोचा था खुद को भूल कर
पालूं खुद से निज़ात शायद
पर हर मोड़ पर वही मैं हूँ
वही तेरा ग़म और मेरी तन्हाई है
खुद कोअलग कर लूँ कैसे
सबमें अपना अंश नज़र आता है
सबमें मैं मुझमें सब
गुँथते जाते अनजाने में
हर चेहरा दर्पण लगता
खुद का अक्स नज़र आता है
