प्रारब्ध

hecblogger's avatarPlaying with words

कितना अच्छा होता गर मैं
फिर से बच्चा बन जाता

जीवन फिर से जी पाता ।१।

समझ पाता बचपन का मोल
माँ का दुलार, डांट के बोल

कुछ खिलोने सहेज पाता ।२।

लड़कपन से क्या लेता मैं
तकिये के नीचे जो सपने थे

आँखों में फिर संजो लाता ।३।

जवानी का वह पहला प्यार
किताब में बंद वह गुलाब

उसकी खुशबू उड़ा लाता ।४।

क्या अलग होता इस बार
गर जीवन फिर से जी पाता

क्या प्रारब्ध से जीत पाता।५।

In response to:Reena’s Exploration Challenge #Week 46

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